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मैकाले शिक्षा पद्धति Macaulay education system

                                   मैकाले शिक्षा पद्धति 

         Macaulay education system

                        


                                      मैकाले

प्राच्यविदों का विचार था कि भारत के प्राचीन गौरव और वैभव को पुनर्जीवित कर सरकार भारत को अच्छी तरह समझ सकती है । उनका यह भी विश्वास था कि अंगरेजी सरकार भारतीयों पर तभी शासन कर सकती है जब वह इन्हें समझ पाएगी । और , यह उनकी संस्कृति को जानकर संभव हो सकता है । उनका यह भी मानना था कि इस प्रकार भारतीयों को भी अपने गौरवमय अतीत और वैभव को समझने में मदद मिलेगी । इन कारणो से उन्होंने संस्कृत व फारसी शिक्षण संस्थाओं को स्थापित करने की सिफारिश की थी । इनकी सिफारिशों पर 1781 में कलकत्ता मदरसा ( अरबी , फारसी , इसलामिक कानून के अध्ययन के लिए ) और 1792 में बनारस में संस्कृत कॉलेज ( प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन के लिए ) की स्थापना की गई थी । पश्चिमी शिक्षा के विकास का एक अन्य कारण यह भी था कि अंगरेजी शासन का विस्तार हो रहा था , जिसके लिए अंगरेजी जाननेवाले भारतीय कर्मचारियों की आवश्यकता हुई । परंतु , अधिकांश कंपनी के अधिकारी प्राच्यविदों से सहमत नहीं थे । वे आंग्लविद् ( Anglicist ) थे । जेम्स मिल , मैकॉले अँगरेजी माध्यम में पाश्चात्य ज्ञान की शिक्षा देना चाहते थे । इनका कहना था कि भारतीय शिक्षा अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक है । इसका अध्ययन केवल धार्मिक ज्ञान बढ़ाएगा । इस प्रकार की शिक्षा वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान नहीं दे सकती है । इनके अनुसार , भारतीयों को वही शिक्षा मिलनी चाहिए जो रोजी - रोटी के लिए उपयोगी और व्यावहारिक है । इसके अतिरिक्त पश्चिमी वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा ही भारतीयों को सभ्य और आधुनिक बना सकती है । इन कारणों से ऐग्लिसिस्टों ने एक लाख रुपये की धनराशि पश्चिमी शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश की । इस दल का जोरदार समर्थन राजा राममोहन राय ने भी किया । मदरसा और संस्कृत शिक्षण की संस्थाओं की स्थापना का उन्होंने विरोध किया । उन्होंने सरकार को लिखा था कि आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान से सरकार भारत का विकास कर सकती है ।

समूह के कड़े विरोध और मैकॉले की प्रभावशाली दलील के कारण सरकार ने पाश्चात्य शिक्षा को विकसित करने का निश्चय किया । मैकॉले भारतीय संस्कृति व साहित्य को घटिया और असभ्य मानता था । उसके अनुसार , भारत का महान ज्ञान और विद्या यूरोप के प्रगतिशील ज्ञान का मुकाबला नहीं कर सकता । उसने कहा था कि यूरोपीय पुस्तकालय का एक खाना ही समस्त भारतीय और अरबी साहित्य के बराबर है । उसके अनुसार , अँगरेजी शिक्षा से भारतीयों को यूरोप के सर्वोत्तम साहित्य को पढ़ने का अवसर प्राप्त होगा , पश्चिमी विज्ञान और दर्शन के अध्ययन से वे आधुनिक बनेंगे । इन विचारों को मैकॉले ने अपने 1835 के मिनट्स ( विवरण ) में रखा । इस आधार पर गवर्नर - जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने इसी वर्ष एक अधिनियम पारित किया । इस अधिनियम के तहत भविष्य में एक लाख रुपये की धनराशि अँगरेजी भाषा के माध्यम से पश्चिमी शिक्षा के विकास में खर्च करने का निश्चय किया गया । संस्कृत और मदरसा की पढ़ाई को किसी प्रकार की सहायता न देने का भी निश्चय किया गया । यह भी तय किया गया कि स्कूलों में भी केवल अँगरेजी माध्यम से शिक्षा दी जाएगी । माना जाता है कि मैकॉले भारत में अँगरेजी शिक्षा के द्वारा भारतीयों का एक ऐसा वर्ग बनाना चाहता था जो जन्म और रंग - रूप से भारतीय हो , मगर सोच - विचार , पसंद - नापसंद और बुद्धि से अँगरेज हों । मैकॉले अँगरेजी शिक्षा का प्रसार केवल उच्चवर्गीय भारतीयों में करना चाहता था । वह मानता था कि जनसमूह में ऐसी शिक्षा का प्रसार करना व्यर्थ होगा । उसका विचार था कि अँगरेजी माध्यम से शिक्षित भारतीय जनसमूह में वर्नाक्यूलर ( भारतीय भाषा ) के द्वारा पश्चिमी ज्ञान , साहित्य एवं विज्ञान को पहुँचाएँगे और इस प्रकार सभी भारतीय वैज्ञानिक शिक्षा से अवगत हो सकेंगे । इसका अर्थ था कि वर्नाक्यूलर भाषाएँ और ज्ञान भी अँगरेजी शिक्षा के साथ विकसित होंगी । उत्तर - पश्चिम ग्रामीण क्षेत्रों में लेफ्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन ने वर्नाक्यूलर भाषा में अंगरेजी शिक्षा का प्रसार किया ।

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